~by Harsh Pandey
सुबह की हल्की धूप जब साल के ऊंचे पेड़ों के बीच से छनकर बम्पा जुआंग साहि के आंगनों में उतरती है, तो मिट्टी की सोंधी गंध के साथ एक नई ऊर्जा भी फैल जाती है. ओडिशा के ढेंकानाल जिले के हिंदोल ब्लॉक में स्थित यह छोटा सा गांव बाहर से भले साधारण दिखे, लेकिन इसके भीतर परिवर्तन की एक शांत लहर बह रही है.
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर गांव के खुले मैदान में रंग और पत्तों की महक घुली हुई थी. जुआंग महिलाएं जमीन पर झुककर रंगोली के रंग सजा रही थीं, तो कुछ महिलाएं साल के पत्तों को सलीके से जोड़कर पारंपरिक खाली चौपाटी तैयार कर रही थीं. यह केवल प्रतियोगिता नहीं थी, यह अपनी पहचान को सहेजने और भविष्य को आकार देने का क्षण था.
“हमारी परंपरा ही हमारी ताकत है,” एक बुजुर्ग महिला ने मुस्कुराते हुए कहा, जब वे अपनी तैयार की गई चौपाटी को ध्यान से देख रही थीं. उनकी आंखों में गर्व साफ झलक रहा था.
परंपरा से आत्मविश्वास तक :
बम्पा गांव जुआंग जनजातीय संस्कृति की जीवित तस्वीर है. यहां की महिलाएं साल के पत्तों से उपयोगी वस्तुएं बनाती हैं. यह कला पीढ़ियों से चली आ रही है. महिला दिवस पर आयोजित प्रतियोगिता ने इस परंपरा को मंच दिया, जिससे युवा पीढ़ी भी अपनी जड़ों से जुड़ सके. रंगोली की आकृतियां केवल सजावट नहीं थीं. वे गांव की सामूहिक आशाओं का प्रतीक बन गईं. हर रंग में एक सपना था, हर रेखा में आत्मविश्वास.
शिक्षा की ओर बढ़ते कदम :
गांव के शिक्षकों और वरिष्ठजनों ने शिक्षा को विकास की कुंजी बताया. बम्पा में अब यह समझ विकसित हो रही है कि बेटियों की शिक्षा केवल परिवार नहीं, पूरे समाज को बदल सकती है।
“हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे पढ़ें और आगे बढ़ें,” एक युवा मां ने कहा, जो अपनी बेटी का हाथ थामे कार्यक्रम में आई थी.
अब गांव में माता पिता बच्चों को नियमित रूप से विद्यालय भेजने लगे हैं. कुछ लड़कियां आगे की पढ़ाई और स्वरोजगार के सपने देख रही हैं. यह बदलाव धीमा है, लेकिन स्थायी और मजबूत है।
जब समस्याएं बनीं चर्चा का विषय
कार्यक्रम के दौरान संवाद सत्र में महिलाओं ने खुलकर अपनी समस्याएं रखीं. स्वच्छ पेयजल की कमी, शौचालय और स्वच्छता सुविधाओं का अभाव, आवास संबंधी कठिनाइयां और सौर ऊर्जा प्रणालियों के खराब होने जैसी चुनौतियां सामने आईं. पहले जहां ऐसी बातें घर की चौखट तक सीमित रहती थीं, अब वे सार्वजनिक मंच पर उठाई जा रही हैं. यह परिवर्तन बताता है कि महिलाएं अब केवल श्रोता नहीं, बल्कि निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहती हैं.
योजनाओं की जानकारी और जागरूकता
समुदाय को विभिन्न सरकारी योजनाओं की जानकारी दी गई ताकि वे अपने अधिकारों का लाभ उठा सकें. जानकारी का अभाव अक्सर विकास में बाधा बनता है, लेकिन बम्पा में अब जागरूकता का विस्तार हो रहा है. गांव में यह सोच मजबूत हो रही है कि विकास बाहर से थोपे जाने वाली प्रक्रिया नहीं, बल्कि भीतर से जागने वाली चेतना है.
नशा मुक्ति और सामाजिक नेतृत्व :
गांव में नशे की समस्या को भी गंभीरता से उठाया गया. महिलाओं से आग्रह किया गया कि वे नशा मुक्ति अभियान में अग्रणी भूमिका निभाएं. बम्पा की महिलाएं अब केवल घर और खेत तक सीमित नहीं रहना चाहती हैं. वे सामाजिक बदलाव की दिशा तय करने के लिए तैयार हैं. यदि यह पहल मजबूत होती है, तो आने वाली पीढ़ियों को एक स्वस्थ वातावरण मिलेगा.
सामूहिकता की शक्ति :
बम्पा की सबसे बड़ी ताकत उसकी सामूहिकता है. यहां उत्सव भी सामूहिक है और संघर्ष भी. महिला दिवस का यह आयोजन गांव की इसी एकजुटता का प्रतीक बन गया.
जब जुआंग महिलाएं साल के पत्तों से परंपरा को गढ़ती हैं और रंगोली के रंगों से अपने सपनों को सजाती हैं, तब बम्पा केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं रहता. वह आत्मसम्मान, साहस और उम्मीद की कहानी बन जाता है.
आज बम्पा परिवर्तन के एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं, लेकिन उनमें निराशा नहीं है. गांव की सुबह अब पहले से अधिक उजली लगती है, क्योंकि यहां की महिलाएं इंतजार नहीं कर रहीं. वे खुद बदलाव की राह बना रही हैं. साल के पत्तों की सरसराहट के बीच बम्पा धीरे-धीरे अपनी नई पहचान लिख रहा है. यह कहानी केवल एक गांव की नहीं, बल्कि उस विश्वास की है जो कहता है कि जब महिलाएं आगे बढ़ती हैं, तो पूरा समाज आगे बढ़ता है.
~by Harsh Pandey

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